क़ब्र की पहली रात
क़ब्र की पहली रात

क़ब्र की पहली रात – क़ब्र की पहली रात का मंजर और इम्तेहान- Qabar Ki Pahli Raat – Part 1

क़ब्र की पहली रात

अल्लाह के बन्दों-क़ब्र की पहली रात का मंजर बड़ा इबरत अंगेज़ है।

क़ब्र की पहली रात यह रात नेकों के लिये बहुत अच्छी है मगर बुरों के लिये बड़ी वहशतनाक है। मौत के बाद जब मुर्दा आलमे बर्ज़ख में पहुंच जाता है तो इस पर क़ब्र की पहली रात आ जाती है क्योंकि इस रात ने हर किसी पर एक ना एक दिन आकर ही रहना है।

क़ब्र की पहली रात हर नये आने वाले मुर्दा से कहती है कि तूने ज़िन्दगी भर बड़ी रातें देखी होंगी मगर मुझ जैसी रात तूने ना कभी देखी होगी ना आइन्दा देखेगा। मुद्दतों भर मैं तेरे इन्तज़ार में रही आख़िर आज तू आ ही पहुंचा है आ देख मैं क्या हूँ।

अगर तू दुनिया से अपने साथ नेक आमाल लाया तो मैं तेरे लिये मज़दऐ बहार हूँ, मताए ला ज़वाल हूँ, हयाते वे मिसाल हूँ, तेरे ईमान का पुरकैफ कमाल हूँ, अल्लाह से तेरी मोहब्बत का जमाल हूँ, तेरे मुक़ददर का चमकता हुआ सितारा हूँ, अदाए सर्मदी का राज़ो नेयाज़ हूँ। मैं तो तेरे इश्क़ का तराना हूँ। गरज़े कि मैं वह रात हूँ जिसमें तेरे लिये राहत ही राहत है। तेरी बख़शिश का एक बहाना हूँ। मैं हर तरह से तेरी ख़िदमतगार हूँ। मेरे यहाँ तेरे लिये इज़्ज़त व रफ्अत है। तेरे गमों का मदावा हूँ। आज तेरे लिये कोई परेशानी नहीं तो यहाँ दोबारा उठने तक बड़े आराम से रह।

क़ब्र की पहली रात बुरे लोगों से कहती है कि मैं तुम्हारे लिये ग़म कदह हूँ। मैं ऐसी क़ैद हूँ जहाँ से कभी छुटकारा नहीं। यहाँ हर तरफ तारीकी ही तारीकी है। यहाँ तुम्हारे बुरे अमलों के बाअस तुम्हें सज़ा मिलेगी। यहाँ की सज़ाऐं बड़ी शदीद हैं कि जिनका तसव्वुर अगर तुम दुनियावी ज़िन्दगी में करो तो खौफज़दा हो जाओगे। काश-तू अल्लाह से डरा होता और आज के लिये कुछ नेक आमाल का सामान पैदा किया होता तो यहाँ तुम्हारे साथ मुजरिमों जैसा सलूक ना होता।

लिहाजा ग़ौर का मुक़ाम है कि क़ब्र की रात के लिये हमेशा तोशए आख़िरत तैयार करना चाहिये ताकि वहाँ ज़िल्लत से बच जायें।

क़ब्र की पहली रात के बारे में हदीस

क़ब्र की पहली रात के बारे में हज़रत अनस बिन मालिक रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि क्या तुम को दो दिनों और दो रातों की ख़बर न दूँ? एक दिन वह है जब बशारत देने वाला तुम्हारे पास आयेगा या तो अल्लाह तआला की रज़ामन्दी या उसकी नाराज़ी का पैगाम लेकर और दूसरा दिन वह है जबकि तुम अल्लाह के हुजूर खड़े होंगे और तुम्हारा नामाए आमाल तुम्हारे हाथ में दिया जाएगा। दायें हाथ में या बायें हाथ में।

एक रात वह है जब मय्यत अपनी पहली रात क़ब्र में गुज़ारेगी। यह रात वह होगी कि उससे क़ब्र की पहली रात पहले ऐसी रात कभी ना आई होगी और एक रात वह है कि जिसकी सुबह कयामत क़ायम होगी कि उसके बाद कोई रात ना होगी।

(बेहक़ी फी शुएव उल ईमान)

क़ब्र की रात का इम्तेहान

क़ब्र में दबाने के बाद इंसान की पहली मंज़िल का इम्तेहान शुरू हो जाता है। क़ब्र का यह इम्तेहान मुर्दे के पास फरिश्तों का आकर सवाल व जवाब करना है।

आलमे बरज़ख में जब कोई दाखिल होता है तो उसकी रूह को क़ब्र में लौटा दिया जाता है। क़ब्र में रूह का लौटाया जाना और मय्यत को बिठाकर फरिश्तों का सवाल व जवाब करना हर शख़्स के लिये यक्साँ है मगर जवाबात और अज्र में फर्क है जिसकी तफसील जैल में है।

इंशाअल्लाह अगली पोस्ट मे ओर जानकारी दी जाएगी Part 2 Read
यह पोस्ट भी पड़ें इसमे हुज़ूर तजुशारियाह के बारे मे बताया गया है 

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